रिटायर्ड जज ने स्थापित की नई परंपरा: तलाक के बाद बेटी का ढोल-नगाड़ों से किया स्वागत
देहरादून। देशभर में इन दिनों उत्तराखंड कैडर के एक रिटायर्ड जज का अनोखा कदम चर्चा का विषय बना हुआ है। ज्ञानेंद्र शर्मा ने सामाजिक धारणाओं को चुनौती देते हुए तलाक के बाद अपनी बेटी का उसी खुशी और सम्मान के साथ घर में स्वागत किया, जैसे कभी उसकी विदाई की थी। मूल रूप से मेरठ …
रिटायर्ड जज ने स्थापित की नई परंपरा: तलाक के बाद बेटी का ढोल-नगाड़ों से किया स्वागत
कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड कैडर के एक रिटायर्ड जज ज्ञानेंद्र शर्मा ने सामाजिक मान्यताओं को चुनौती देते हुए अपनी बेटी का तलाक के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ स्वागत किया। उनकी इस पहल ने पूरे देश में चर्चा का विषय बना दिया है।
देहरादून: हाल ही में, ज्ञानेंद्र शर्मा नाम के रिटायर्ड जज का अनोखा कदम लोगों के बीच चर्चा का कारण बना। उन्होंने तलाक के बाद अपनी बेटी प्रणिता का वही सम्मान और खुशी के साथ स्वागत किया, जैसा उन्होंने उसकी विदाई के समय किया था। यह कदम न केवल परिवार के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण था, बल्कि यह समाज में महिलाओं के प्रति सम्मान का उदाहरण भी प्रस्तुत करता है।
ज्ञानेंद्र शर्मा, जो मूल रूप से मेरठ के निवासी हैं, ने अपनी बेटी को फैमिली कोर्ट से घर लाते समय ढोल-नगाड़ों के साथ जश्न मनाया। इस खास अवसर पर, पूरे परिवार ने 'I Love My Daughter' लिखी टी-शर्ट पहनकर एकजुटता और स्नेह का प्रदर्शन किया। यह दर्शाता है कि प्यार और समर्थन का कोई विकल्प नहीं होता।
शर्मा ने कहा, "जब मेरी बेटी का जन्म हुआ था, तो उस समय परिवार ने उसका जोरदार स्वागत किया था। ठीक उसी भावना को पुनः जीवित करने के लिए मैंने यह कदम उठाया। यह संदेश देना महत्वपूर्ण था कि उसकी मूल्यवानता आज भी उतनी ही है।" उन्होंने यह भी कहा कि जब उनकी बेटी की शादी हुई थी, तब उन्होंने खुशी-खुशी उसे विदा किया, लेकिन जब वह अपने ससुराल में खुश नहीं थीं, तो उसे वहां जबरन रहने के लिए मजबूर करना गलत होता।
ज्ञानेंद्र शर्मा का मानना है कि "बेटी कभी पराई नहीं होती और उसका सम्मान हर परिस्थिति में होना चाहिए।" उनकी यह सोच समाज में न केवल प्रगतिशीलता का परिचायक है, बल्कि यह महिलाओं के अधिकारों और उनके सम्मान के लिए भी एक महत्वपूर्ण कदम है।
जानकारी के अनुसार, प्रणिता की शादी 2018 में शाहजहांपुर के एक परिवार में हुई थी। शादी के बाद, उसे कई मानसिक और भावनात्मक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जिसे देखते हुए परिवार ने उसे सम्मानपूर्वक घर वापस लाने का निर्णय लिया।
ज्ञानेंद्र शर्मा ने महिला सशक्तिकरण पर अध्ययन किया है और इस विषय पर एक पुस्तक भी लिखी है। उनका कहना है कि महिला सशक्तिकरण का सिद्धांत केवल विचारों में नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे व्यवहार में भी लाना चाहिए।
उन्होंने अपनी न्यायिक सेवा के बारे में बताया कि उन्होंने LL.B. के बाद उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा में प्रवेश किया और उत्तराखंड कैडर में पदस्थापित हुए। वे जिला एवं सत्र न्यायाधीश के पद से सेवानिवृत्त हुए और उत्तराखंड न्यायिक अकादमी में निदेशक के रूप में भी कार्य कर चुके हैं।
इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि पारंपरिक सोच को चुनौती देकर कैसे समाज में बदलाव लाया जा सकता है। ऐसे उदाहरण आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं और समाज में संवेदनशीलता और समझ को बढ़ावा देते हैं।
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सादर,
टीम इंडिया ट्वोडे (नीया शर्मा)
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