उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की निगरानी, वसुंधरा ताल में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित

रैबार डेस्क: उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों के फटने से संभावित खतरे को भांपने और उनकी सतत... The post ग्लेशियल झीलों की गतिविधियों पर रहेगी नजर, वसुंधरा ताल में लगा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम appeared first on Uttarakhand Raibar.

Oct 14, 2026 - 00:27
 63  2773

उत्तराखंड में ग्लेशियल झीलों की निगरानी, वसुंधरा ताल में अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित

Breaking News, Daily Updates & Exclusive Stories - India Twoday

कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड ने चमोली जिले के वसुंधरा ताल में एक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित किया है, जिसके जरिए ग्लेशियल झीलों के फटने के जोखिम को समय पर भांपना संभव होगा।

रैबार डेस्क: उत्तराखंड के चमोली जिले में ग्लेशियल झीलों के फटने से संभावित खतरों से निपटने के लिए एक अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित किया गया है। इस प्रणाली को आपदा प्रबंधन विभाग द्वारा वसुंधरा ताल में लगाया गया है, जिसको लेकर वैज्ञानिकों का दल सफलतापूर्वक अपनी स्थापना कर वापस लौट चुका है।

सतत निगरानी के लिए अत्याधुनिक तकनीक

उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों की भौगोलिक चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, टीम ने वसुंधरा ताल के आसपास विभिन्न प्रकार के अत्याधुनिक सेंसर स्थापित किए हैं। यह प्रणाली प्राकृतिक आपदाओं की वैज्ञानिक निगरानी को नई दिशा प्रदान करेगी। 29 सितंबर को मुख्य सचिव द्वारा दल को हरी झंडी दिखाने के बाद यह अभियान शुरू हुआ।

मुख्यमंत्री की ओर से समर्थन

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस प्रणाली की स्थापना पर खुशी व्यक्त करते हुए कहा कि इससे हिमालयी क्षेत्रों में संभावित खतरों की पहचान करना आसान होगा। उन्होंने कहा, "इस तरह की तकनीकी पहल से आपदा प्रबंधन प्रणाली को अधिक सशक्त बनाया जाएगा।" वसुंधरा ताल में यह प्रणाली स्थानीय निवासियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और समय पर चेतावनी देने में मददगार सिद्ध होगी।

झील की निगरानी के लिए सेंसर की स्थापना

यह प्रणाली विभिन्न सेंसरों से सुसज्जित है। इन सेंसरों में ऑल-इन-वन मौसम सेंसर शामिल है, जो हवा की गति, वर्षा, वायुमंडलीय दबाव, और तापमान के आंकड़े मापेगा। इसके अलावा, जल स्तर की निगरानी के लिए फ्लोटिंग और सबमर्ज्ड वाटर लेवल सेंसर, भू-गतिविधियों के लिए एक्सेलेरोमीटर एवं टिल्ट सेंसर शामिल हैं। इस तकनीक के माध्यम से भविष्य में संभावित बाढ़ और ग्लेशियर्स के गिरने से उत्पन्न जोखिमों की पहचान आसान होगी।

वसुंधरा ताल का महत्त्व

वसुंधरा ताल की गहराई लगभग 38.50 मीटर है, जबकि इसकी चौड़ाई 600 मीटर और लंबाई 900 मीटर है। केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (सीबीआरआई), रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. डीपी कानूनगो ने बताया कि इस ताल की स्थिति को लेकर कोई खास बदलाव नहीं देखा गया है।

डेटा की नियमित निगरानी

प्रणाली के माध्यम से हर दो घंटे में संबंधित डैशबोर्ड पर डेटा भेजा जाएगा, जिससे तत्काल आवश्यक कदम उठाए जा सकेंगे। किसी आपात स्थिति में सेंसर तुरंत डेटा भेजने में सक्षम होंगे, जिससे संभावित असामान्य घटनाओं की पहचान भी समय पर हो सकेगी।

संचार में स्थिरता

वसुंधरा ताल में सामान्य मोबाइल संचार की कमी को ध्यान में रखते हुए, इरिडियम उपग्रह संचार तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। यह सुनिश्चित करेगा कि सेंसरों से प्राप्त डेटा सुरक्षित रूप से डैशबोर्ड तक पहुंच सके।

ऊर्जा आपूर्ति का ध्यान

इस दुर्गम क्षेत्र में ऊर्जा की स्थिर आपूर्ति के लिए सौर पैनल और बैटरी का उपयोग किया गया है। इस प्रणाली में 280 एम्पीयर की बैटरी लगाई गई है, जो प्रतिकूल मौसम में भी सहायता करेगी।

स्थानीय सामग्री का उपयोग

उपकरणों की स्थापना हेतु स्थानीय सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। सीमेंट की बजाय मजबूत पत्थरों का सहारा लिया गया है, जिससे संरचना भी मजबूती से खड़ी रह सके।

यह महत्वपूर्ण पहल न केवल हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन को सशक्त बनाएगी, बल्कि स्थानीय निवासियों के लिए सुरक्षा के नए मानक स्थापित करेगी।

अधिक जानकारी के लिए, कृपया हमारी वेबसाइट पर जाएं: India Twoday

सादर, टीम इंडिया टुडे - स्नेहा शर्मा

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow