कोटद्वार में अवैध खनन के मामले में प्रशासन की लापरवाही पर उठे सवाल, एसडीएम पर ₹15,000 की शास्ति

कोटद्वार। वर्ष 2020 में कोटद्वार क्षेत्र में रिवर ट्रेनिंग के नाम पर हुए कथित अवैध खनन के मामले में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत सामने आई जानकारी ने तहसील प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सूचना के अधिकार के तहत की गई शिकायत की सुनवाई में सामने आया कि अवैध खनन …

Oct 3, 2026 - 00:27
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कोटद्वार में अवैध खनन के मामले में प्रशासन की लापरवाही पर उठे सवाल, एसडीएम पर ₹15,000 की शास्ति
कोटद्वार। वर्ष 2020 में कोटद्वार क्षेत्र में रिवर ट्रेनिंग के नाम पर हुए कथित अवैध खनन के मामले में

कोटद्वार में अवैध खनन: प्रशासन की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल

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कम शब्दों में कहें तो, कोटद्वार क्षेत्र में 2020 में रिवर ट्रेनिंग के नाम पर हुए अवैध खनन मामले में तहसील प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठे हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी ने यह साबित किया है कि आवश्यक अभिलेखों का रिकॉर्ड उपजिलाधिकारी कार्यालय में गायब है, जिसके चलते वर्तमान एसडीएम को ₹15,000 की शास्ति दी गई है।

कोटद्वार शहर, जिसे स्वच्छता और विकास के लिए जाना जाता है, अब अवैध खनन की कथित समस्याओं के कारण चर्चा में है। यह मामला 2020 में उस समय सामने आया था जब रिवर ट्रेनिंग के नाम पर खनन कार्य दरकरार किया गया, जो कि नियमों का स्पष्ट उल्लंघन था। सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत की गई शिकायतों की जांच में यह बात सामने आई कि तहसीलदार द्वारा प्रस्तुत निरीक्षण आख्या और सिंचाई विभाग द्वारा भेजे गए पत्र उपजिलाधिकारी के कार्यालय में उपलब्ध नहीं थे।

आरटीआई कार्यकर्ता मुजीब नैथानी द्वारा दी गई शिकायत के अनुसार, तहसील स्तर पर इस अवैध खनन की पुष्टि हुई थी। लेकिन इस पर तत्कालीन उपजिलाधिकारी ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। शिकायत की सुनवाई के दौरान जब आवश्यक दस्तावेज मांगे गए, तो उपजिलाधिकारी कार्यालय ने यह स्पष्ट किया कि उन अभिलेखों का रिकॉर्ड उनके पास नहीं है।

इस मामले की गंभीरता को समझते हुए सूचना आयुक्त दिलीप सिंह कुंवर ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। उन्हें पता चला कि योगेश सिंह मेहरा उस समय कोटद्वार के उपजिलाधिकारी थे, और वर्तमान उपजिलाधिकारी संदीप कुमार द्वारा मांगी गई सूचनाएं भी उपलब्ध नहीं कराई गईं। इसके परिणामस्वरूप आयोग ने संदीप कुमार पर ₹15,000 की शास्ति लगाने का आदेश दिया। यह राशि दो किस्तों में अदा की जाएगी।

इस प्रकार की घटनाएं हमें दर्शाती हैं कि कैसे कुछ सरकारी अधिकारियों की लापरवाही के कारण हमारी प्राकृतिक संसाधनों का शोषण हो रहा है। हालाँकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब यह अवैध खनन का मामला शुरू हुआ था, उस समय दिलीप सिंह कुंवर गढ़वाल मंडल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक थे। अब, कई वर्षों बाद, आरटीआई के माध्यम से जिन दस्तावेज़ों का खुलासा हुआ है, उन्होंने प्रशासन की पूर्ववर्ती कार्रवाई को और भी संदेहास्पद बना दिया है।

हालांकि, यह स्पष्ट है कि कई महत्वपूर्ण दस्तावेज़ इस मामले से जुड़े हुए, वर्तमान में कार्यालय में उपलब्ध नहीं थे। इससे यह सवाल उठता है कि अवैध खनन की वास्तविक स्थिति क्या थी और तत्कालीन अधिकारियों ने किस प्रकार की कार्रवाई की थी। यदि यह स्थिति रहती है तो भविष्य में भी इसी प्रकार के सवाल उठने की संभावना है।

इस घटना ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि स्थानीय प्रशासन को इन मामलों पर अधिक सतर्क और जिम्मेदार होना पड़ेगा। यदि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को सही तरीके से प्रबंधित नहीं करते हैं, तो इसके दुष्परिणाम हमारे भविष्य पर भारी पड़ सकते हैं।

अंत में, यह बात ध्यान देने योग्य है कि हमारे प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा हम सभी की जिम्मेदारी है। यदि किसी भी प्रकार की अनियमितता होती है, तो हमें उस पर उचित कार्रवाई करने के लिए तैयार रहना चाहिए।

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टीम इंडिया टुडे, साक्षी मिश्रा

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