हाथों की कला की महक: देहरादून के ताम्रशिल्प कारीगर का समृद्ध विरासत
देहरादून: उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत न केवल उसकी बोली, रीति-रिवाज या परंपराओं में है, बल्कि उन हाथों में भी बसती है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनी कला को जीवित रखते आए हैं। देहरादून के टम्टा मोहल्ला में रहने वाले विमल टम्टा भी ऐसे ही एक हुनरमंद कारीगर हैं, जो आज के मशीन युग में भी तांबे के […] The post मशीनों के दौर में हाथों की चमक: विरासत को संजोने वाला देहरादून का ताम्रशिल्प का कारीगर l first appeared on Vision 2020 News.
हाथों की कला की महक: देहरादून के ताम्रशिल्प कारीगर का समृद्ध विरासत
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कम शब्दों में कहें तो, देहरादून के विमल टम्टा ताम्रशिल्प की पारंपरिक कला को प्रज्वलित रखते हैं, जो समय के साथ भी फल-फूल रही है।
देहरादून: उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत केवल बोली, रीति-रिवाज और परंपराओं में ही नहीं, बल्कि उन श्रमिकों के हाथों में भी बसती है जो पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी अनोखी कला को जीवित रखते आए हैं। देहरादून के टम्टा मोहल्ले में रहने वाले विमल टम्टा ऐसे ही एक हुनरमंद कारीगर हैं, जो मशीनों के आगमन के बावजूद तांबे के बर्तन बनाने की सदियों पुरानी कला को अपने हाथों से जीवित रखे हुए हैं।
परंपरा, स्वास्थ्य और कला का अद्भुत मेल
विमल टम्टा बताते हैं कि उनके बनाए तांबे के बर्तन न केवल देखने में संतोषजनक होते हैं, बल्कि स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी अत्यधिक लाभकारी माने जाते हैं। वे तांबे से गिलास, जग, थाली, पाथा, गगरी, जलकुंडी, भोंकर (वाद्य यंत्र), पूजा सामग्री और यहां तक कि उंगलियों के लिए तांबे की रिंग भी बनाते हैं। इन वस्तुओं की सुंदरता में एक अनूठा आकर्षण होता है, जो हर घर की सजावट में चार चांद लगा देता है।
हस्तनिर्मित बर्तन: मशीनों के मुकाबले हाथों की कारीगरी
अल्मोड़ा जिले के टम्टा मोहल्ला, जिसे कभी ‘ताम्रनगरी’ भी कहा जाता था, यहां 400 वर्षों से तांबे के बर्तन बनाने की परंपरा चल रही है। विमल का मानना है कि यह कार्य मशीनों से नहीं, बल्कि हाथ की सूझ-बूझ और कारीगरी से किया जाता है। हर बर्तन में बारीकी से कला को उकेरा जाता है। यही कारण है कि इनके बनाए उत्पादों की देशभर और विदेशों में मांग भी है।
विरासत महोत्सव में बजा ताम्रशिल्प का जादू
हाल ही में देहरादून में आयोजित ‘विरासत महोत्सव’ में विमल टम्टा द्वारा बनाए गए तांबे के बर्तनों ने खासा ध्यान खींचा। इन चमकते बर्तनों को देखकर न केवल बुजुर्गों की यादें ताजा हुईं, बल्कि नई पीढ़ी भी इन बर्तनों की ओर आकर्षित हुई। यह महोत्सव निश्चित तौर पर ताम्रशिल्प की महानता और उसके स्थान को पुनर्जीवित करने में सफल रहा।
नई पीढ़ी में घटती रुचि: फिर भी आस कायम
जहां विमल अपनी कला को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं यह भी सत्य है कि टम्टा मोहल्ला की नई पीढ़ी इस कठिन और मेहनत वाले काम में कम रुचि ले रही है। विमल मानते हैं कि यदि सरकार और समाज का सहयोग मिले, तो यह पारंपरिक हस्तकला एक बार फिर नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकती है। यह जरूरी है कि इस कला को आने वाली पीढ़ियों में सही तरीके से पेश किया जाए।
बाजार और मूल्य निर्धारण
वर्तमान में तांबे की कीमत ₹1100 से ₹1400 प्रति किलो के बीच है, और उत्पादों की कीमत उनके वजन और डिजाइन के आधार पर तय की जाती है। टम्टा मोहल्ला में बनाए गए बर्तन अल्मोड़ा और आस-पास के बाजारों में बेचे जाते हैं। इन बर्तनों की विशेषता और गुणवत्ता के चलते उनकी मांग हमेशा बनी रहती है।
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लेखक: सुमन कुमारी, टीम इंडिया टुडे
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