शहीद हेमू कालाणी की 103वीं जयंती: देशभक्ति और बलिदान का प्रेरणादायक अध्याय

नई दिल्ली। सिंधी देशभक्त क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी हेमू कालाणी की 103वीं जयंती के अवसर पर देशभर में उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की गई। विभिन्न संगठनों और नागरिकों ने उनके बलिदान को याद करते हुए युवाओं से उनके आदर्शों पर चलने का आह्वान किया। हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को सिंध प्रांत (अब …

Mar 24, 2026 - 00:27
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शहीद हेमू कालाणी की 103वीं जयंती: देशभक्ति और बलिदान का प्रेरणादायक अध्याय
नई दिल्ली। सिंधी देशभक्त क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी हेमू कालाणी की 103वीं जयंती के अवसर पर

शहीद हेमू कालाणी की 103वीं जयंती: देशभक्ति और बलिदान का प्रेरणादायक अध्याय

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कम शब्दों में कहें तो, स्वतंत्रता सेनानी हेमू कालाणी की 103वीं जयंती पर देशभर में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की गई है। विभिन्न संगठनों और नागरिकों ने उनके बलिदान को याद करते हुए युवा पीढ़ी से उनके आदर्शों का अनुसरण करने की अपील की।

नई दिल्ली। सिंधी देशभक्त क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी हेमू कालाणी का जन्म 23 मार्च 1923 को सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान) के सुक्कुर में हुआ था। उनके पिता का नाम पेसूमल कालाणी और माता का नाम जेठी बाई था। प्रारंभिक शिक्षा सुक्कुर में ही प्राप्त करने के बाद, हेमू कालाणी ने स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़कर स्वराज सेना के माध्यम से कई क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई।

स्वतंत्रता संग्राम में हेमू कालाणी का योगदान

हेमू कालाणी का नाम भारत छोड़ो आंदोलन से गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसे अगस्त क्रांति के नाम से भी जाना जाता है। महात्मा गांधी के “करो या मरो” के आह्वान ने उन्हें इस आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। वर्ष 1942 में, उन्होंने अपने साथियों के साथ ब्रिटिश सैनिकों और गोला-बारूद से भरी एक ट्रेन को पटरी से उतारने का साहसिक प्रयास किया। दुर्भाग्य से, इसी दौरान उन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जबकि उनके साथी भागने में सफल रहे।

फांसी की सजा और उनके अद्वितीय साहस

ब्रिटिश सरकार ने हेमू कालाणी को फांसी की सजा सुनाई। इस दौरान, सिंध के कई प्रमुख लोगों ने उनकी दया के लिए याचिकाएँ दायर कीं, लेकिन शर्त यह रखी गई कि वह अपने साथियों की जानकारी प्रदान करें। हेमू ने इस शर्त को ठुकरा दिया और अपने देश के प्रति अपनी निष्ठा को बनाए रखा। 21 जनवरी 1943 को, मात्र 19 वर्ष की आयु में उन्हें फांसी दे दी गई। उनकी एक अद्भुत अंतिम इच्छा थी - उन्होंने पुनः भारत में जन्म लेने की इच्छा जताई और “इंकलाब जिंदाबाद” तथा “भारत माता की जय” के नारों के साथ हंसते-हंसते फांसी को स्वीकार किया।

युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत

हेमू कालाणी की शहादत आज भी युवाओं के लिए देशभक्ति और त्याग का अद्वितीय उदाहरण बनी हुई है। उनकी जयंती के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में वक्ताओं ने कहा कि हेमू कालाणी का जीवन साहस, समर्पण और राष्ट्रप्रेम का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत करता है।

यह जयंती हमें ये याद दिलाती है कि कैसे कुछ व्यक्ति अपने प्राणों की परवाह किए बिना देश के लिए लड़े। हमें हेमू कालाणी के आदर्शों का अनुसरण करना चाहिए और उनके बलिदान को कभी नहीं भूलना चाहिए।

युवाओं को प्रेरित करते हुए, आयोजकों ने कहा कि हमें अपने देश की स्वतंत्रता की कीमत को समझना होगा और इसे सुरक्षित रखने के लिए कार्यरत रहना चाहिए। हेमू कालाणी का जीवन प्रत्येक भारतीय के लिए प्रेरणा का स्रोत है और हमें उनके बलिदान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनी चाहिए।

अंत में, हम सभी यह संकल्प लें कि हम अपने देश की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहेंगे और हेमू कालाणी जैसे शहीदों की याद को जीवित रखेंगे। उनके आदर्श हमें जीवन में सकारात्मक दिशा देंगे।

फिर से, देश की आज़ादी के लिए उनके संघर्ष को याद करते हुए, हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अन्य नेताओं को भी धन्यवाद देना चाहेंगे, जिन्होंने इस महान आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की।

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धन्यवाद।

सादर, टीम इंडिया ट्वोडे, प्रिया शर्मा

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