धराली में बर्फ के विशाल टुकड़े से आई विनाशकारी आपदा, इसरो की रिपोर्ट का खुलासा

रैबार डेस्क:  धराली में 05 अगस्त 2025 को आई जलप्रलय की असल और अधिक स्पष्ट... The post 69 लाख किलो के बर्फ के टुकड़े ने मिटाया धराली का वजूद, इसरो की नई रिपोर्ट में सामने आई बात appeared first on Uttarakhand Raibar.

Mar 5, 2026 - 18:27
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धराली में बर्फ के विशाल टुकड़े से आई विनाशकारी आपदा, इसरो की रिपोर्ट का खुलासा
रैबार डेस्क:  धराली में 05 अगस्त 2025 को आई जलप्रलय की असल और अधिक स्पष्ट... The post 69 लाख किलो के बर्फ के टुकड

धराली में बर्फ के विशाल टुकड़े से आई विनाशकारी आपदा, इसरो की रिपोर्ट का खुलासा

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कम शब्दों में कहें तो, 5 अगस्त 2025 को धराली में आई भीषण जलप्रलय की असली वजह एक बड़े आइस-पैच के टूटने से रही, जिसका वजन 69 लाख किलो था। यह जानकारी इसरो की नई रिपोर्ट में सामने आई है।

धराली में 05 अगस्त 2025 को आई जलप्रलय की असल और अधिक स्पष्ट वजह सामने आई है। अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने सेटेलाइट चित्रों के नए अध्ययन में न केवल इस बात की पुष्टि की है कि धराली आपदा 39 लाख किलो के बर्फ के बड़े टुकड़े के ग्लेशियर से नीचे खिसकने से हुई, बल्कि इसके आकार-प्रकार का भी विश्लेषण किया है। इसरो के वैज्ञानिकों ने अपनी नई जांच में निष्कर्ष निकाला है कि यह आपदा न बादल फटने से हुई थी और न ही ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) से, बल्कि श्रीकंठ ग्लेशियर क्षेत्र में मौजूद एक विशाल आइस-पैच (बर्फ के खंड) के अचानक ढहने से उत्पन्न हुई थी।

आइस-पैच का डरावना आकार

अध्ययन के अनुसार, श्रीकंठ ग्लेशियर से 0.25 वर्ग किमी (आयतन 75 हजार घन मीटर) का हिमखंड टूटकर गिरा। इससे 69 लाख किलो बर्फ नीचे ढलान की तरफ गिर गई और तेज घर्षण के साथ वह पानी में तब्दील होने लगी। इस स्थिति ने जलप्रलय को और भी विकराल बना दिया जिससे समूचे धराली को तबाह कर दिया। खीर गंगा कैचमेंट के ऊपरी क्षेत्रों में जमा भारी मलबा (मोरेन) भी धराली की दिशा में लुढ़कने लगा, जिससे तबाही और बढ़ गई।

घटना का समयरेखा निर्माण

इसरो के वैज्ञानिकों ने मल्टी-टेम्पोरल सैटेलाइट इमेजरी, हाई-रेज़ोल्यूशन डीईएमएस और वीडियो फुटेज का विश्लेषण कर घटना की पूरी टाइमलाइन बनाई। रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2025 में 5,220 मीटर ऊंचाई पर एक बड़ा आइस-पैच खुला दिखाई दिया था, जो 15 साल के रिकॉर्ड में पहले कभी नहीं दिखा था। घटना के 12 अगस्त की इमेजरी में यह आइस-पैच पूरी तरह गायब पाया गया और वहां पर ताजा क्षरण की गहरी निशानियां देखी गईं।

बर्फ के खंड के टूटने के निशान आपदा के 55 दिन बाद भी देखने को मिले। यह भारी हिमखंड लगभग 1,700 मीटर नीचे खीर गंगा चैनल की ओर गिरा, जिससे उसकी रफ्तार और तेज हो गई और खीरगंगा का प्रवाह विकराल हो गया। इसका प्रचंड वेग, मोरेन का वेग और खीरगंगा का वेग मिलकर बेहद घातक स्थिति पैदा कर गए और उन्होंने खीरगंगा की धारा को तबाही का कारण बना दिया।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव

रिपोर्ट में कहा गया है कि 3 से 5 अगस्त के बीच बारिश हल्की से मध्यम थी और स्थानीय निवासियों की ओर से रिकार्ड किए गए वीडियो में तेज, अचानक आई मलबा-युक्त लहर देखने को मिली, जो सामान्य मानसून बाढ़ के पैटर्न से मेल नहीं खाती थी। यह घटना मास-रिलीज इवेंट से मेल खाती थी, जिससे फ्लैश फ्लड का कारण स्पष्ट हुआ।

क्या है आइस-पैच?

रिपोर्ट में बताया गया है कि आइस-पैच ग्लेशियर नहीं होता, बल्कि यह बर्फ, फर्न और बर्फीली परतों का स्थिर द्रव्यमान होता है। जब गर्मी बढ़ती है, तो इसकी ऊपरी सुरक्षा परत पिघल जाती है, जिससे यह यांत्रिक रूप से कमजोर हो जाता है। हिमालय में बढ़ती गर्मी और घटती बर्फबारी के कारण ऐसे आइस-पैच तेजी से अनावृत और अस्थिर हो रहे हैं। इसरो ने चेतावनी दी है कि इस तरह की स्थिति क्रायो-हाइड्रोलाजिकल खतरा है, जिसकी निगरानी भविष्य में अनिवार्य है।

रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि हिमालय के संवेदनशील क्षेत्रों में आइस-पैच की मानिटरिंग को शामिल किया जाना चाहिए। साथ ही, एक अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करना भी आवश्यक है। मानसून में बादलों के छाए रहने के कारण आप्टिकल सैटेलाइट से अध्ययन या निगरानी करना मुश्किल होता है, इसलिए रडार सैटेलाइट के साथ-साथ ग्राउंड मानिटरिंग का एकीकृत सिस्टम भी आवश्यक है।

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