नैनीताल हाईकोर्ट की सुनवाई: NIM में अनियमितताओं पर केंद्र-राज्य से जवाब तलब

नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (NIM) में वर्ष 2018 से 2022 के बीच कथित अनियमितताओं को लेकर दायर जनहित याचिका पर नैनीताल हाईकोर्ट में गुरुवार को सुनवाई हुई। मामले की सुनवाई के बाद अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार से विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की …

Apr 9, 2026 - 18:27
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नैनीताल हाईकोर्ट की सुनवाई: NIM में अनियमितताओं पर केंद्र-राज्य से जवाब तलब
नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (NIM) में वर्ष 2018 से 2022 के बीच कथित अनियमितताओं को लेकर दायर जनहित याचिका पर

नैनीताल हाईकोर्ट की सुनवाई: NIM में अनियमितताओं पर केंद्र-राज्य से जवाब तलब

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कम शब्दों में कहें तो नैनीताल हाईकोर्ट ने नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (NIM) में 2018 से 2022 के दौरान हुई कथित अनियमितताओं से संबंधित जनहित याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकार से विस्तृत उत्तर प्रस्तुत करने के लिए कहा है।

गुरुवार को नैनीताल हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की पीठ ने यह सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पूर्व में दिए गए निर्देशों के बावजूद संबंधित पक्षों द्वारा अब तक कोई जवाब दाखिल नहीं किया गया था। यह देखकर पक्षकारों ने अतिरिक्त समय मांगने का अनुरोध किया, जिस पर अदालत ने उन्हें शपथ पत्र के साथ जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

क्या है मामला?

यह जनहित याचिका दिनेश चंद्र उनियाल द्वारा दायर की गई है, जिसमें यह आरोप लगया गया है कि उत्तरकाशी स्थित NIM में 2018 से 2022 के बीच कई प्रकार की अनियमितताएं हुईं। याचिका में यह भी कहा गया है कि रोजगार देने के नाम पर गड़बड़ियों की नियुक्ति की गई है, जिसकी निष्पक्ष जांच कराए जाने की मांग की गई है।

सरकार का पक्ष

राज्य और केंद्र सरकार ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि संस्थान में किसी भी प्रकार की अनियमितता नहीं हुई है। उन्होंने यह भी बताया कि भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा पहले ही इस मामले की जांच की जा चुकी है, जिसमें किसी भी गड़बड़ी की पुष्टि नहीं हुई। इस संदर्भ में सरकार का कहना है कि सभी प्रक्रियाएं निष्पक्ष और पारदर्शी रही हैं।

कोर्ट का रुख

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को आरोपों के संबंध में विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने अगली सुनवाई तक पक्षकारों को अपना पक्ष स्पष्ट करने का एक और अवसर प्रदान किया है। इस तरह की संदिग्धता और उसके बाद की कार्रवाई पर समाज का ध्यान जाना स्वाभाविक है।

यह मामला सिर्फ एक अदालत की सुनवाई नहीं है, बल्कि यह सवाल उठाता है कि क्या सरकारी संस्थान में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी हुई है। इस प्रकरण पर आगे की कार्रवाई समाज के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि इससे पूरे संस्थान पर और उसकी कार्यक्षमता पर विश्वास स्थापित होता है।

उम्मीद है कि उच्च न्यायालय इस मामले की गंभीरता को समझते हुए इसके सभी पहलुओं पर ध्यान देगा। इसके साथ ही, भारत सरकार और राज्य सरकार को भी अपनी जिम्मेदारियों का पालन करने की आवश्यकता है।

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साभार टीम इंडिया टुडे सुचित्रा शर्मा

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