मैडम भीकाजी कामा की 165वीं जयंती: साहस और समर्पण की महान गाथा

मुंबई। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अपने साहस, त्याग और राष्ट्रवादी विचारों से महत्वपूर्ण योगदान देने वाली महान क्रांतिकारी एवं स्वतंत्रता सेनानी मैडम भीकाजी कामा की आज 165वीं जयंती है। 24 सितंबर 1861 को बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) के एक संपन्न पारसी परिवार में जन्मीं भीकाजी कामा ने अपना जीवन समाजसेवा और देश की स्वतंत्रता के …

Sep 25, 2026 - 00:27
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मैडम भीकाजी कामा की 165वीं जयंती: साहस और समर्पण की महान गाथा
मुंबई। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अपने साहस, त्याग और राष्ट्रवादी विचारों से महत्वपूर्ण योगद

मैडम भीकाजी कामा की 165वीं जयंती: साहस और समर्पण की महान गाथा

कम शब्दों में कहें तो आज भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपने योगदान के लिए अमर रहीं मैडम भीकाजी कामा की 165वीं जयंती है। उन्होंने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्षों को समाज सेवा और देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित किया।

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मुंबई। महान क्रांतिकारी और राष्ट्रवादी स्वतंत्रता सेनानी मैडम भीकाजी कामा को आज 165वीं जयंती पर याद किया गया। 24 सितंबर 1861 को बॉम्बे (वर्तमान मुंबई) के एक समृद्ध पारसी परिवार में जन्मीं, भीकाजी कामा ने समाजService और मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

उनके पिता सोराबजी फ्रामजी पटेल एक प्रतिष्ठित व्यवसायी और वकील थे, जबकि उनकी माता का नाम जैजीबाई सोराबजी पटेल था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा एलेक्जेंड्रा गर्ल्स इंग्लिश स्कूल, बॉम्बे में हुई, जहां उन्होंने मेधावी छात्रा के रूप में अपनी पहचान बनाई। भाषाओं के प्रति उनकी विशेष रुचि ने उन्हें प्रारंभिक जीवन में ही एक समर्पित समाज सेविका बना दिया।

विवाह और समाज सेवा

मैडम भीकाजी कामा का विवाह 3 अगस्त 1885 को रुस्तमजी कामा से हुआ। हालांकि इस रिश्ते की मिठास कम हुई, इसके बावजूद भीकाजी ने समाज सेवा और परोपकार के कार्यों में अपनी ऊर्जा लगाई।

प्लेग महामारी के दौरान साहस की मिसाल

1896 में, बॉम्बे प्रेसीडेंसी में प्लेग महामारी का प्रकोप फैल गया। भीकाजी कामा ने ग्रांट मेडिकल कॉलेज के साथ मिलकर चिकित्सा एवं राहत कार्यों में सक्रियता दिखाई। वे खुद भी प्लेग से संक्रमित हो गईं, लेकिन अपने साहस के साथ इस मुश्किल घड़ी को पार किया।

ब्रिटेन में राष्ट्रवादी आंदोलन

1902 में स्वास्थ्य लाभ के लिए ब्रिटेन भेजी गईं भीकाजी कामा ने वहाँ श्यामजी कृष्ण वर्मा और दादाभाई नौरोजी जैसे राष्ट्रवादी नेताओं के संपर्क में आकर स्वतंत्रता आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उन्होंने इंडिया होम रूल सोसायटी की स्थापना में भी योगदान दिया और ब्रिटिश शासन के दबाव का सामना करते हुए 1905 में पेरिस चली गईं।

पेरिस में स्वतंत्रता की अलख जगाना

पेरिस में, भीकाजी कामा ने सरदार सिंह राणा सहित अन्य राष्ट्रवादियों के साथ मिलकर पेरिस इंडियन सोसायटी की स्थापना की। उनके प्रयासों के फलस्वरूप ‘वंदे मातरम्’ नामक पत्र का प्रकाशन हुआ, जिसके जरिए भारतीय स्वतंत्रता के समर्थन में विचारों का संचार हुआ।

स्टुटगार्ट में ऐतिहासिक ध्वज फहराना

18 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टुटगार्ट में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सोशलिस्ट कांग्रेस में मैडमभीकाजी कामा ने भारत का तिरंगा ध्वज फहराया। यह न केवल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की एक महत्वपूर्ण घटना थी, बल्कि यह भारतीय गर्व का प्रतीक भी बन गई।

अंतिम समय और विरासत

लगभग 30 वर्षों तक राष्ट्रवादी गतिविधियों में सक्रिय रहने के बाद, बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण 1935 में उन्हें भारत लौटने की अनुमति मिली। उनके जीवन का अंत 13 अगस्त 1936 को हुआ।

मैडम भीकाजी कामा का साहस और राष्ट्र के प्रति समर्पण आगे की पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनका संदेश हमेशा भारतीय इतिहास खासकर स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण रहेगा: "भारत स्वतंत्र हो, भारत गणराज्य हो और भारत एकजुट रहे।"

भारत के इतिहास में उनके योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता है। उनके बलिदान और संघर्ष की कहानी हमेशा हमें प्रेरित करती रहेगी।

और इस प्रकार, हम इस महान क्रांतिकारी को उनकी 165वीं जयंती पर याद करते हैं।

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सादर, टीम इंडिया टुडे - स्नेहा शर्मा

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