23 अप्रैल 1930 पेशावर: जब रॉयल गढ़वाल राइफल्स ने कहा - “हम अपने भाइयों पर गोली नहीं चलाएंगे”
प्रशांत सी. बाजपेयी ब्रिटिश शासन के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 23 अप्रैल 1930 को पेशावर के क़िस्सा ख्वानी बाज़ार में एक बड़ा और दर्दनाक नरसंहार हुआ। यह घटना महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय की है, जब देशभर में अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध तेज़ हो रहा था। उत्तर-पश्चिम …
23 अप्रैल 1930 पेशावर: जब रॉयल गढ़वाल राइफल्स ने कहा - “हम अपने भाइयों पर गोली नहीं चलाएंगे”
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कम शब्दों में कहें तो, 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में हुए नरसंहार ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में एक नया मोड़ दिया। रॉयल गढ़वाल राइफल्स के कुछ सैनिकों ने निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने से इनकार कर दिया था, जो उस समय एक साहसिक कदम था।
प्रशांत सी. बाजपेयी ने बताया कि ब्रिटिश शासन के खिलाफ चल रहे स्वतंत्रता आंदोलन के क्रम में यह घटना हुई। यह वही समय था जब महात्मा गांधी का सविनय अवज्ञा आंदोलन चल रहा था, जिसमें देशभर में अंग्रेज़ों के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन किए जा रहे थे।
पेशावर का क़िस्सा ख्वानी बाज़ार
उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (जो अब पाकिस्तान में है) में, खान अब्दुल ग़फ़्फ़ार खान, जिन्हें ‘सीमांत गांधी’ के नाम से जाना जाता है, ने अहिंसा का प्रचार किया। उनकी और अन्य नेताओं की गिरफ़्तारी के खिलाफ 23 अप्रैल को क़िस्सा ख्वानी बाज़ार में एक शांतिपूर्ण जुलूस निकाला गया। यह जुलूस निहत्थे लोगों, व्यापारियों और आम नागरिकों से भरा हुआ था।
सुबह से ही बड़ी संख्या में स्थानीय लोग, सभी धर्मों के लोग, एकत्रित हो गए थे। इस आंदोलन का उद्देश्य अहिंसक तरीके से विरोध जताना था। लेकिन, स्थिति नियंत्रित करने के लिए ब्रिटिश पुलिस ने बख्तरबंद गाड़ियां भेजीं। इससे हालात और बिगड़ गए और वहां एक गाड़ी में आग लग गई।
नरसंहार का सामना
इसके परिणामस्वरूप, ‘रॉयल गढ़वाल राइफल्स’ की 2/18 बटालियन और अन्य ब्रिटिश सैनिकों को बुलाया गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, बिना किसी चेतावनी के, सैनिकों को निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया गया और उन्होंने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। इस गोलीबारी में लगभग 400 से 600 लोग मारे गए, और 1200 से अधिक लोग घायल हुए। यह घटना 1919 के जलियाँवाला बाग़ हत्याकांड के बाद भारतीय इतिहास में एक और बड़ी त्रासदी साबित हुई।
असहमति और साहस का प्रतीक
हालांकि, इस घटना में एक महत्त्वपूर्ण और साहसिक पहलू भी था। रॉयल गढ़वाल राइफल्स की दो प्लाटून्स ने इस आदेश का पालन करने से मना कर दिया। हवलदार चंद्र सिंह गढ़वाली के नेतृत्व में, सैनिकों ने अपने हथियार नीचे रख दिए और कहा कि वे अपने ही लोगों पर गोली नहीं चलाएंगे।
इस अवज्ञा ने उन्हें कोर्ट-मार्शल का सामना करने के लिए मजबूर किया और उन्हें कठोर सजाएं दी गईं। लेकिन, यह कदम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नैतिक साहस और देशभक्ति की मिसाल बन गया। ऐसे सैनिकों ने दिखाया कि एक सच्चा देशभक्त हमेशा अपने भाईयों का साथ देता है।
एक दर्दनाक अध्याय
क़िस्सा ख्वानी बाज़ार का यह नरसंहार भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और मार्मिक अध्याय के रूप में दर्ज है। इस घटना में शहीद हुए सभी लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है, जिन्होंने अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए अपने प्राणों की आहुति दी और स्वतंत्रता की इस लड़ाई को आगे बढ़ाया।
इस प्रकार, 23 अप्रैल 1930 की यह घटना न केवल एक दुखद घटना थी, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम में साहस और मानवता का एक महत्वपूर्ण उदाहरण भी प्रस्तुत करती है।
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सादर, श्रीमती अंजलि शर्मा, Team India Twoday
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