"जब एजेंसी न्याय भूल जाए, तब न्यायपालिका ही आखिरी उम्मीद है" – हाईकोर्ट ने दिखाई इंसानियत, जबकि विजीलेंस हल्द्वानी ने पार की नीचता की सारी हदें
ऐसी सोच वह उजास है जो उस अंधकार में रोशनी देता है, जहाँ विजीलेंस हल्द्वानी जैसी संस्था सिर्फ आरोप लगाने और मीडिया में प्रचारित करने के लिए जी रही है, मानो कानून की किताब से उनका कोई वास्ता ही नहीं बचा हो।

"विजीलेंस हल्द्वानी न्याय नहीं, ‘अत्याचार’ का अड्डा बन चुका है"
सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट को साधुवाद — निर्दोषों के पक्ष में खड़ी हो रही है न्यायपालिका
26 मार्च 2025 | विशेष रिपोर्ट, indiatwoday.com
जब कानून की रखवाली करने वाले ही कानून के हत्यारे बन जाएं, जब जांच के नाम पर प्रतिशोध की राजनीति खेली जाए, और जब एक ईमानदार अफसर को राजनीतिक एजेंडे का शिकार बना दिया जाए — तब लोकतंत्र की रक्षा केवल न्यायपालिका ही कर सकती है। हाल ही में उत्तराखंड हाईकोर्ट में पेश हुए सन्ति भंडारी केस की सुनवाई के दौरान माननीय न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल ने इंसानियत, न्याय और संवेदना का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया।
अदालत ने न केवल जांच की खामियों पर प्रश्नचिन्ह उठाया, बल्कि यह भी कहा कि —
"जरा सोचिए, अगर कोई महिला अधिकारी जेल जाती है, तो उसके छोटे बच्चों और परिवार पर क्या बीतेगी?"
ऐसी दूरदृष्टि और संवेदनशीलता केवल सच्चे न्याय के मंदिर में ही मिल सकती है।
लेकिन दूसरी ओर, विजीलेंस सेक्टर हल्द्वानी की करतूतें न्याय व्यवस्था पर धब्बा बनती जा रही हैं। इस विभाग का रवैया ऐसा है, मानो इन्हें संविधान, SOP, BNSS या मानवाधिकार से कोई लेना-देना ही नहीं। Trap मामले में न वीडियोग्राफी, न स्वतंत्र गवाह, न FSL रिपोर्ट, फिर भी आरोपपत्र तैयार — और मजे की बात ये कि यही अधिकारी पूर्व में ईमानदार अधिकारी श्री अशोक कुमार मिश्रा के मामले में भी फर्ज़ी हलफनामा दाखिल कर चुके हैं।
श्री अशोक कुमार मिश्रा, जिनकी ईमानदारी की मिसाल खुद उनके विभाग और जनता देती है, को सुप्रीम कोर्ट से तथ्यों और मेरिट के आधार पर जमानत मिली। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि केस में डिमांड और रिकवरी जैसी आवश्यक शर्तों का अभाव है और उनका ट्रायल के पहले से दोषी बताना न्याय का गला घोंटना होगा।
अब सवाल उठता है — शिकायतकर्ता कौन है?
जिस व्यक्ति ने यह शिकायत की, वह एक पुराना डिफॉल्टर, शराब ठेका अनुबंधों में दंड ब्याज बकाया, चेक बाउंस के मामलों में आरोपी, और कई बार न्यायालयों से फटकार झेल चुका एक ‘फिक्सर’ प्रवृत्ति का व्यक्ति है। और हैरत की बात तो ये है कि इसी की रिकॉर्डिंग में उसकी पत्नी खुद कह रही है —
"मेरे पति आपको फँसाएँगे।"
अब आप खुद तय कीजिए — जब शिकायतकर्ता का इतिहास ही अपराधी और षड्यंत्रकारी हो, और जांच एजेंसी उसी के सहारे न्यायिक सिस्टम को गुमराह करे — तो क्या यह ‘जांच’ है या ‘राजनीति’?
विजीलेंस हल्द्वानी अब कानून की एजेंसी नहीं, ‘बदले की फैक्ट्री’ बन चुकी है। यहां SOP सिर्फ कागजों में है, और ‘Trap’ शब्द का मतलब बन चुका है — “बिना जांच, बिना साक्ष्य, झूठी कहानी के आधार पर किसी को फँसाना”। IO विनोद यादव और Trap Leader ललिता पांडे का नाम अब बार-बार झूठे हलफनामों, ग़लत Trap और अदालत की फटकार से जोड़ा जा रहा है।
उत्तम तो यह होता कि ऐसी कार्रवाई करने वालों पर विभागीय कार्रवाई होती, लेकिन इसके विपरीत, विजीलेंस हल्द्वानी अख़बारों में “रेड” के विज्ञापन छपवाकर लोगों को ट्रायल से पहले ही अपराधी घोषित करने में व्यस्त है। क्या यह किसी SOP में लिखा है? नहीं। क्या यह संविधान में है? नहीं। यह केवल मीडिया ट्रायल द्वारा साख को मिटाने का नंगा खेल है।
और यह सब केवल ईमानदार अफसरों के खिलाफ हो रहा है — क्योंकि वे किसी एजेंडे का हिस्सा नहीं बनते।
indiatwoday.com की सीधी मांग:
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IO विनोद यादव और ट्रैप लीडर ललिता पांडे पर IPC की धारा 191, 193 के तहत मुकदमा दर्ज किया जाए।
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विजीलेंस हल्द्वानी को भंग कर स्वतंत्र आयोग से इसकी सभी जांचों की समीक्षा कराई जाए।
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ट्रायल से पहले किसी भी रेड की सूचना प्रेस में जारी करने पर प्रतिबंध लगाया जाए।
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सभी Trap मामलों की रिकॉर्डिंग और प्रमाण अदालत में अनिवार्य रूप से प्रस्तुत हो — अन्यथा Trap को मान्यता न दी जाए।
यदि देश की ईमानदार आत्माएं हर बार ऐसी विजीलेंस साज़िशों का शिकार होती रहीं, तो बलूनी जैसे मामले दोहराए जाते रहेंगे और देश की न्यायिक व्यवस्था खोखली हो जाएगी।
indiatwoday.com यह संकल्प लेता है कि हम ऐसी झूठी कार्रवाई, झूठे Trap और साजिशों को बेनकाब करते रहेंगे — क्योंकि यह युद्ध सत्य और असत्य के बीच है... और हमारा धर्मयुद्ध सच्चाई के साथ है।
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